मैंने लिक्खे नहीं ये पल ख़ुद से / संकल्प शर्मा

मैंने लिक्खे नहीं ये पल ख़ुद से,
हो गई बस यूँ ही ग़ज़ल ख़ुद से।

तुझको दिल से निकालने के लिए,
लड़ता रहता हूँ आजकल ख़ुद से।

तेरी यादें तो बस बहाने हैं,
मेरा झगडा है दर-असल ख़ुद से।

इस से पहले के साजिशें होतीं,
ढह गया सपनों का महल ख़ुद से।

जब से वो हमसफ़र हुए हैं मेरे,
मंजिलें हो गयीं सहल ख़ुद से।

triveni – sankalp sharma

बिन मिटे किसने देखी है जन्नत,
ये दरिया डूब के ही पार हुआ

इसका ‘नेचर’ कुछ कुछ तुमसा है

तेरी बातें तेरे अल्फाज़ – sankalp sharma

अब अक्सर…
तेरी बातें तेरे अल्फाज़,
यूँ मुट्ठी में दबाए फिरता हूँ।
जैसे बच्चे के हाथों में
पूरे हफ़्ते की ’जेबखर्ची’ के सिक्के।
जितना कसके पकड़ता हूँ.. कमबख़्त!
फिसलते जाते हैं यूँ ही।
जैसे फिसले थे तेरे सुर्ख लबों से उस दिन,
वो जाँफरोज़ अल्फाज़ …
वो नग्मगीन बात…

वही बातें वही अल्फाज़
जिन्हें थामे रखा था
एक मुद्दत से…

बह गए हाथ से
और छोड़ गए चन्द लकीरें

कभी फुर्सत मिले तो
फिर से एक दिन,
तुम चली आना….
इन हाथों की लकीरों से,
तुम्हें कुछ याद आएगा,
इन हाथों की लकीरों को,
ज़रा सा ग़ौर से सुनना ….

सुना है आजकल…
ये लकीरें बात करती हैं…।

gazal – sankalp sharma

किसकी तसल्ली पर मैं रोकूँ अश्कों के सैलाब मेरे,
देख के दीवानों-सी हालत हँसते हैं अहबाब[1] मेरे।

जब से गए हो नहीं चहकती चिड़िया आकर खिड़की में,
और महकना भूल गए हैं बाल्कनी के गुलाब मेरे।

उम्मीद के दामन से लिपटे हम कब तक तेरी राह तकें,
या तो दीद[2] की सूरत दे या बिखरा दे सब ख्वाब मेरे।

पूछ रहा है यूँ तू मुझसे राज़ मेरी बर्बादी के,
ज़रा संभालना रुला न डालें तुझको कहीं जवाब मेरे।

शब्दार्थ:

1. ↑ दोस्त
2. ↑ देखने को

ये मुमकिन है कि मिल जाएँ तेरी खोई चीज़ें / हस्तीमल ‘हस्ती’

ये मुमकिन है कि मिल जाएँ तेरी खोयी हुई चीज़ें
क़रीने से सजा कर रख ज़रा बिखरी हुई चीज़ें

कभी यूँ भी हुआ है हंसते-हंसते तोड़ दी हमने
हमें मालूम नहीं था जुड़ती नहीं टूटी हुई चीज़ें

ज़माने के लिए जो हैं बड़ी नायब और महंगी
हमारे दिल से सब की सब हैं वो उतरी हुई चीज़ें

दिखाती हैं हमें मजबूरियाँ ऐसे भी दिन अक़्सर
उठानी पड़ती हैं फिर से हमें फेंकी हुई चीज़ें

किसी महफ़िल में जब इंसानियत का नाम आया है
हमें याद आ गई बाज़ार में बिकती हुई चीज़ें

इस बार मिले हैं ग़म कुछ और तरह से भी / हस्तीमल ‘हस्ती’

इस बार मिले हैं ग़म, कुछ और तरह से भी
आँखें है हमारी नम, कुछ और तरह से भी

शोला भी नहीं उठता, काजल भी नहीं बनता
जलता है किसी का ग़म, कुछ और तरह से भी

हर शाख़ सुलगती है, हर फूल दहकता है
गिरती है कभी शबनम, कुछ और तरह से भी

मंज़िल ने दिए ताने, रस्ते भी हँसे लेकिन
चलते रहे अक़्सर हम, कुछ और तरह से भी

दामन कहीं फैला तो, महसूस हुआ यारों
क़द होता है अपना कम, कुछ और तरह से भी

उसने ही नहीं देखा, ये बात अलग वरना
इस बार सजे थे हम, कुछ और तरह से भी

चल मेरे साथ ही चल / हसरत जयपुरी

चल मेरे साथ ही चल ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़ल
इन समाजों के बनाये हुये बंधन से निकल, चल

हम वहाँ जाये जहाँ प्यार पे पहरे न लगें
दिल की दौलत पे जहाँ कोई लुटेरे न लगें
कब है बदला ये ज़माना, तू ज़माने को बदल, चल

प्यार सच्चा हो तो राहें भी निकल आती हैं
बिजलियाँ अर्श से ख़ुद रास्ता दिखलाती हैं
तू भी बिजली की तरह ग़म के अँधेरों से निकल, चल

अपने मिलने पे जहाँ कोई भी उँगली न उठे
अपनी चाहत पे जहाँ कोई दुश्मन न हँसे
छेड़ दे प्यार से तू साज़-ए-मोहब्बत-ए-ग़ज़ल, चल

पीछे मत देख न शामिल हो गुनाहगारों में
सामने देख कि मंज़िल है तेरी तारों में
बात बनती है अगर दिल में इरादे हों अटल, चल

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