कहानी दिए और तूफ़ान की

निर्बल से लड़ाई बलवान की
ये कहानी है दिए की और तूफ़ान की
इक रात अंधियारी, थी दिशाए कारी-कारी
मंद-मंद पवन था चल रहा
अंधियारे को मिटाने, जग में ज्योत जगाने
एक छोटा सा दिया था कही जल रहा…..
कही दूर था तूफ़ान, दिए से था बलवान
सारे जग को मसलने मचल रहा
एक नन्हा सा दिया, उसने हमला किया
अब देखो लीला विधि के विधान की…
दुनिया ने साथ छोड़ा, ममता ने मुख मोड़ा
अब दिए पे ये दुःख पड़ने लगा
पर हिम्मत न हार, मन में मरना विचार
अत्याचार की हवा से लड़ने लगा…
लड़ते-लड़ते वो थका, फिर भी बुझ न सका
उसकी ज्योत में था बल रे सच्चाई का….
सर पटक-पटक, पग झटक-झटक
न हटा पाया दिए को अपनी आन से
बार-बार वार कर, अंत में हार कर
तूफ़ान भागा रे मैदान से..
तूफ़ान भागा रे मैदान से…

दास्ताँ ऐ ख़ुमार बाराबंकवी

ऐ मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुज़र गए
आ जा कि ज़हर खाए ज़माने गुज़र गए

ओ जाने वाले! आ कि तेरे इंतज़ार में
रस्ते को घर बनाए ज़माने गुज़र गए
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सलीका हो अगर भीगी पलकों को पढ़ने का,
तो बहते हुए आंसू अक्सर बात करते हैं…
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इक आँसू कह गया सब हाल दिल का
मैं समझा था ये ज़ालिम बेज़बाँ है

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रात बाक़ी थी जब वो बिछड़े थे
कट गई उम्र रात बाक़ी है

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मुझ को शिकस्ते दिल का मज़ा याद आ गया
तुम क्यों उदास हो गए क्या याद आ गया

कहने को ज़िन्दगी थी बहुत मुक्तसर मगर
कुछ यूँ बसर हुई कि ख़ुदा याद आ गया

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आंधियो जाओ अब आराम करो
हम ख़ुद अपना दिया बुझा बैठे

जी तो हल्का हुआ मगर यारो
रो के हम लुत्फ़-ऐ-गम बढ़ा बैठे

जब से बिछड़े वो मुस्कुराए न हम
सब ने छेड़ा तो लब हिला बैठे

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हाले-ग़म उन को सुनाते जाइए
शर्त ये है मुस्कुराते जाइए

आप को जाते न देखा जाएगा
शम्मअ को पहले बुझाते जाइए

दुश्मनों से प्यार होता जाएगा
दोस्तों को आज़माते जाइए

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मौत आए तो दिन फिरें शायद
ज़िन्दगी ने तो मार डाला है

गुलज़ार

अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो कि दास्ताँ आगे और भी है
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो
अभी तो टूटी है कच्ची मिट्टी, अभी तो बस जिस्म ही गिरे हैं
अभी तो किरदार ही बुझे है,
अभी सुलगते हैं रूह के ग़म
अभी धड़कतें है दर्द दिल के
अभी तो एहसास जी रहा है

यह लौ बचा लो जो थक के किरदार की हथेली से गिर पड़ी है
यह लौ बचा लो यहीं से उठेगी जुस्तजू फिर बगुला बन कर
यहीं से उठेगा कोई किरदार फिर इसी रोशनी को ले कर
कहीं तो अंजाम-ए-जुस्तजू के सिरे मिलेंगे
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो

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बस्ता फ़ेंक के लोची भागा रोशनआरा बाग़ की जानिब
चिल्लाता : ‘चल गुड्डी चल’
पक्के जामुन टपकेंगे’

आँगन की रस्सी से माँ ने कपड़े खोले
और तंदूर पे लाके टीन की चादर डाली

सारे दिन के सूखे पापड़
लच्छी ने लिपटा ई चादर
‘बच गई रब्बा’ किया कराया धुल जाना था’

ख़ैरु ने अपने खेतों की सूखी मिट्टी
झुर्रियों वाले हाथ में ले कर
भीगी-भीगी आँखों से फिर ऊपर देखा

झूम के फिर उट्ठे हैं बादल
टूट के फिर मेंह बरसेगा

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गोल फूला हुआ ग़ुब्बारा थक कर
एक नुकीली पहाड़ी यूँ जाके टिका है
जैसे ऊँगली पे मदारी ने उठा रक्खा हो गोला
फूँक से ठेलो तो पानी में उतर जाएगा

भक से फट जाएगा फूला हुआ सूरज का ग़ुब्बारा
छन-से बुझ जाएगा इक और दहकता हुआ दिन

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खुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में
एक पुराना खत खोला अनजाने में

जाना किसका ज़िक्र है इस अफ़साने में
दर्द मज़े लेता है जो दुहराने में

शाम के साये बालिस्तों से नापे हैं
चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में

रात गुज़रते शायद थोड़ा वक्त लगे
ज़रा सी धूप दे उन्हें मेरे पैमाने में

दिल पर दस्तक देने ये कौन आया है
किसकी आहट सुनता है वीराने मे ।

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खिड़की पिछवाड़े को खुलती तो नज़र आता था
वो अमलतास का इक पेड़, ज़रा दूर, अकेला-सा खड़ा था
शाखें पंखों की तरह खोले हुए
एक परिन्दे की तरह
बरगलाते थे उसे रोज़ परिन्दे आकर
सब सुनाते थे वि परवाज़ के क़िस्से उसको
और दिखाते थे उसे उड़ के, क़लाबाज़ियाँ खा के
बदलियाँ छू के बताते थे, मज़े ठंडी हवा के!

आंधी का हाथ पकड़ कर शायद
उसने कल उड़ने की कोशिश की थी
औंधे मुँह बीच-सड़क आके गिरा है!!
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आँखों में जल रहा है क्यूँ बुझता नहीं धुआँ
उठता तो है घटा-सा बरसता नहीं धुआँ

चूल्हे नहीं जलाये या बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गये हैं अब उठता नहीं धुआँ

आँखों के पोंछने से लगा आँच का पता
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ

आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमाँ ये घर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ
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मोड़ पे देखा है वो बूढ़ा-सा इक आम का पेड़ कभी?
मेरा वाकिफ़ है बहुत सालों से, मैं जानता हूँ

जब मैं छोटा था तो इक आम चुराने के लिए
परली दीवार से कंधों पे चढ़ा था उसके
जाने दुखती हुई किस शाख से मेरा पाँव लगा
धाड़ से फेंक दिया था मुझे नीचे उसने
मैंने खुन्नस में बहुत फेंके थे पत्थर उस पर

मेरी शादी पे मुझे याद है शाखें देकर
मेरी वेदी का हवन गरम किया था उसने
और जब हामला थी बीबा, तो दोपहर में हर दिन
मेरी बीवी की तरफ़ कैरियाँ फेंकी थी उसी ने

वक़्त के साथ सभी फूल, सभी पत्ते गए

तब भी लजाता था जब मुन्ने से कहती बीबा
‘हाँ उसी पेड़ से आया है तू, पेड़ का फल है।’

अब भी लजाता हूँ, जब मोड़ से गुज़रता हूँ
खाँस कर कहता है,”क्यूँ, सर के सभी बाल गए?”

सुबह से काट रहे हैं वो कमेटी वाले
मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको!

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चिपचिपे दूध से नहलाते हैं

आंगन में खड़ा कर के तुम्हें ।

शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या

घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलसियाँ भर के
औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर

पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो

इक पथराई सी मुस्कान लिए

बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी ।
जब धुआँ देता, लगातार पुजारी

घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर

इक जरा छींक ही दो तुम,

तो यकीं आए कि सब देख रहे हो ।

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एक नदी की बात सुनी…
इक शायर से पूछ रही थी
रोज़ किनारे दोनों हाथ पकड़ कर मेरे
सीधी राह चलाते हैं
रोज़ ही तो मैं
नाव भर कर, पीठ पे लेकर
कितने लोग हैं पार उतार कर आती हूँ ।

रोज़ मेरे सीने पे लहरें
नाबालिग़ बच्चों के जैसे
कुछ-कुछ लिखी रहती हैं।

क्या ऐसा हो सकता है जब
कुछ भी न हो
कुछ भी नहीं…
और मैं अपनी तह से पीठ लगा के इक शब रुकी रहूँ
बस ठहरी रहूँ
और कुछ भी न हो !
जैसे कविता कह लेने के बाद पड़ी रह जाती है,
मैं पड़ी रहूँ…!

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एक परवाज़ दिखाई दी है
तेरी आवाज़ सुनाई दी है

जिस की आँखों में कटी थी सदियाँ
उस ने सदियों की जुदाई दी है

सिर्फ़ एक सफ़ाह पलट कर उस ने
बीती बातों की सफ़ाई दी है

फिर वहीं लौट के जाना होगा
यार ने कैसी रिहाई दी है

आग ने क्या क्या जलाया है शव पर
कितनी ख़ुश-रंग दिखाई दी है

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एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी
ऐसा तो कम ही होता है वो भी हो तनहाई भी

यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं
कितनी सौंधी लगती है तब माँझी की रुसवाई भी

दो दो शक़्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में
मेरे साथ चला आया है आप का इक सौदाई भी

ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी है
उन की बात सुनी भी हमने अपनी बात सुनाई भी

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क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं
नज़र समेटे हुए खड़ा हूँ
जुनूँ ये मजबूर कर रहा है पलट के देखूँ
ख़ुदी ये कहती है मोड़ मुड़ जा
अगरचे एहसास कह रहा है
खुले दरीचे के पीछे दो आँखें झाँकती हैं
अभी मेरे इंतज़ार में वो भी जागती है
कहीं तो उस के गोशा-ए-दिल में दर्द होगा
उसे ये ज़िद है कि मैं पुकारूँ
मुझे तक़ाज़ा है वो बुला ले
क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं
नज़र समेटे हुए खड़ा हूँ

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किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, कट गया है
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे,

 छूते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे !!

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किस क़दर सीधा सहल साफ़ है यह रस्ता देखो
न किसी शाख़ का साया है, न दीवार की टेक
न किसी आँख की आहट, न किसी चेहरे का शोर
न कोई दाग़ जहाँ बैठ के सुस्ताए कोई
दूर तक कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं

चन्द क़दमों के निशाँ, हाँ, कभी मिलते हैं कहीं
साथ चलते हैं जो कुछ दूर फ़क़त चन्द क़दम
और फिर टूट के गिरते हैं यह कहते हुए
अपनी तनहाई लिये आप चलो, तन्हा, अकेले
साथ आए जो यहाँ, कोई नहीं, कोई नहीं
किस क़दर सीधा, सहल साफ़ है यह रस्ता

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नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी

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Welcome to my life !!

To be hurt, to feel lost,
To be left out in the dark,
To be kicked, when you’re down,
To feel like you’ve been pushed around,
To be on the edge of breaking down,
And no one’s there to save you,
No you don’t know what it’s like,
Welcome to my life

Don’t tell me who I should be
And don’t try to tell me what’s right for me
Don’t tell me what I should do
I don’t wanna waste my time
I’ll watch you fade away!!!!

So shut up, shut up, shut up
Don’t wanna hear it
Get out, get out, get out
Get out of my way
Step up, step up, step up
You’ll never stop me
Nothing you say today
Is gonna bring me down!!!

No you don’t know what it’s like,
Welcome to my life !!

बचपन

बचपन के दुःख भी कितने अच्छे थे
तब तो सिर्फ खिलोने टूटा करते थे
वो खुशियाँ भी न जाने कैसी खुशियाँ थी
तितली को पकड़ के उछला करते थे
पांव मार के खुद बारिश के पानी में,
अपने आप को भिगोया करते थे
अब तो एक आँसू भी रुसवा कर जाता है
बचपन में तो दिल खोल के रोया करते थे ..

Gulzar

Shafaq

Roz sahil pe khade hoke yahi dekha hai
Shaam ka pighla hua surkh-sunhari rogan
Roz matiyale-se paani mein yeh ghul jaata hai

Roz sahil pe khade hoke yahi socha hai
Mein jo pighali huee rangeen shafaq ka rogan
Ponchh loo haathon pe

Aur chpuke se ik baar kabhi
Tere gulnaar se rukhsaaron pe chhap se mal doon
Shaam ka pighala hua surkh-sunhari rogan

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Aao Phir Nazm Kahen
Phir Kisi Dard Ko Sahla Ke Suja Le Ankhen
Phir Kisi Dukhti Rag Se Chhua De Nashtar
Ya Kisi Bhooli Huee Raah Pe Mudkar
Ek Baar Naam Lekar Kisi Hamnam Ko Awaz Hi De Le
Phir Koi Nazm Kahen

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Alaava

Raat bhar sard hawa chalti rahi
Raat bha hamne alaav taapa
Maine maazi se kai khushk see shaakhien kaati
Tumne bhi gujre hue lamhon ke patte tode
Meine jebon se nikali sabhi sukhi nazme
Tumne bhi haathon se murjhaaye hue khat khole
Apnee in aankhon se meine kai maanze tode
Aur haathon se kai baasi lakeeren phenki
Tumne palkon pe nami sookh gayee thee, so gira di

Raat bhar jo bhi mila ugte badan par humko
Kaat ke daal diya jalte alaawon main use
Raat bhar phoonkon se har lau ko jagaye rakha
Aur do zismon ke indhan ko jalaye rakha
Raat bhar bujhte hue rishte ko taapa humne

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Humdum

Mod pe dekha hai wo boodha-sa ek ped kabhi ?
Mera waqif hai, bahut salon se mein use jaanata hoon

Jab mein chhota tha to ik aam udaane ke liye
Parli deewar se kandhon pe chadha tha uske
Jaane dukhti huee kis shaakh se jaa paanv lagaa
Dhaad se phenk diya tha muje neeche usne
Meine khunnas main bahut phenke the pathar us par

Meri shaadi pe mujhe yaad hai shaakhein dekar
Meri vedi ka hawan garm kiya tha usne
Aur jab haamla thi ‘Biba’ to dopahar main har din
Meri biwi ki taraf kairiyan phenki thi isi ne
Waqt ke saath sabhi phool, sabhi patti gaye

Tab bhi jal jaata tha jab Munne se kehti ‘Biba’
‘Haan,usi ped se aaya hai tu, Ped ka phal hai’
Ab bhi jal jaata hoon. jab mod se gujarte mein kabhi
Khaanskar kehta hai, ‘Kyo, Sar ke sabhi baal gaye?’

‘Subah se kaat rahe hain woh Kameti wale
Mod tak jaane ki himmat nahin hoti mujhko’

तारे ज़मीं पर

देखो इन्हें, ये हैं ओस की बूँदें
पत्तों की गोद में, आस्माँ से कूदें
अँगडाई लें, फिर करवट बदल कर
नाज़ुक-से मोती, हँस दें फिसलकर

खो न जायें ये…तारे ज़मीं पर !

ये तो हैं सर्दी में, धूप की किरणे
उतरें तो आँगन को सुनहरा-सा कर दें
मन के अँधेरों को रौशन-सा कर दें
ठिठुरती हथेली की रँगत बदल दें

खो न जायें ये…तारे ज़मीं पर !

जैसे आँखों की डिबिया में निँदिया
और निँदिया में मीठा-सा सपना
और सपने में मिल जाए फ़रिश्ता-सा कोई
जैसे रँगों भरी पिचकारी
जैसे तितलियाँ, फूलों की क्यारी
जैसे बिना मतलब का, प्यारा रिश्ता हो कोई

ये तो आशा की लहर हैं
ये तो उम्मीद की सहर है
खुशियों की नहर है

खो न जायें ये…तारे ज़मीं पर !

देखो रातों के सीने पे ये तो
झिलमिल किसी लौ-से उगे हैं
ये तो अँबिया की खुश्बू है – बाग़ों से बह चले
जैसे काँच में चूडी के टुकडे
जैसे खिले-खिले फूलों के मुखडे
जैसे बँसी कोई बजाए पेडों के तले

ये तो झोंके हैं पवन के
हैं ये घुँघरू जीवन के
ये तो सुर है चमन के

खो न जायें ये…तारे ज़मीं पर !

मुहल्ले की रौनक़ गलियाँ हैं जैसे
खिलने की ज़िद पर कलियाँ हों जैसे
मुठ्ठी में मौसम की जैसे हवाएँ
ये हैं बुज़ुर्ग़ों के दिल की दुआएँ

खो न जायें ये…तारे ज़मीं पर !

कभी बातें जैसे दादी नानी
कभी छलकें जैसे “मम्-मम्” पानी
कभी बन जाएँ भोले, सवालों की झडी
सन्नाटे में हँसी के जैसे
सूने होंठों पे खुशी के जैसे
ये तो नूर हैं बरसे गर, तेरी क़िसमत हो बडी

जैसे झील मे लहराए चँदा
जैसे भीड में अपने का कँधा
जैसे मनमौजी नदिया, झाग उडाए कुछ कहे
जैसे बैठे-बैठे मीठी-सी झपकी
जैसे प्यार की धीमी-सी थपकी
जैसे कानों में सरगम हरदम बजती ही रहे

खो न जायें ये…तारे ज़मीं पर !

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