ek sher

kabhi kisi ko muquamal jahan nahi milta…..
kahin zameenn to kahin aasamaan nahi milta
tere jahaan mein aisa nahi ki pyaar na ho ….
jahan umeed ho iski wahan nahi milta…

मौत तू एक कविता है ..

मौत तू एक कविता है ..
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको ..

डूबती नब्जों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिए चाँद उफक तक पहुंचे
दिन अभी पानी में हो रात किनारे के करीब
न अभी अन्धेरा हो, न उजाला हो, न रात न दिन
जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को सांस आए .

मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको ..
मौत तू एक कविता है ..
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको ..

कहानी दिए और तूफ़ान की

निर्बल से लड़ाई बलवान की
ये कहानी है दिए की और तूफ़ान की
इक रात अंधियारी, थी दिशाए कारी-कारी
मंद-मंद पवन था चल रहा
अंधियारे को मिटाने, जग में ज्योत जगाने
एक छोटा सा दिया था कही जल रहा…..
कही दूर था तूफ़ान, दिए से था बलवान
सारे जग को मसलने मचल रहा
एक नन्हा सा दिया, उसने हमला किया
अब देखो लीला विधि के विधान की…
दुनिया ने साथ छोड़ा, ममता ने मुख मोड़ा
अब दिए पे ये दुःख पड़ने लगा
पर हिम्मत न हार, मन में मरना विचार
अत्याचार की हवा से लड़ने लगा…
लड़ते-लड़ते वो थका, फिर भी बुझ न सका
उसकी ज्योत में था बल रे सच्चाई का….
सर पटक-पटक, पग झटक-झटक
न हटा पाया दिए को अपनी आन से
बार-बार वार कर, अंत में हार कर
तूफ़ान भागा रे मैदान से..
तूफ़ान भागा रे मैदान से…

एक मासूम मुहब्बत पे मचा है घमसान / सतीश बेदाग़

एक मासूम मुहब्बत पे मचा है घमासान
दूर तक देख समन्दर में उठा है तूफ़ान

एक लड़की थी सिखाती थी जो खिलकर हँसना
आज याद आई है, तो हो आई है सीली मुस्कान

एक वो मेला, वो झूला, वो मिरे संग तस्वीर
क्या पता ख़ुश भी कहीं है, कि नहीं वो नादान

फिर से बचपन हो, तिरा शहर हो और छुट्टियाँ हों
काश मैं फिर रहूँ, कुछ रोज़ तिरे घर मेहमान

एक मुंडेर पे, इक गाँव में इक नाम लिखा है
रोज़ उस में से ही खुलता है ये नीला आसमान

मैंने लिक्खे नहीं ये पल ख़ुद से / संकल्प शर्मा

मैंने लिक्खे नहीं ये पल ख़ुद से,
हो गई बस यूँ ही ग़ज़ल ख़ुद से।

तुझको दिल से निकालने के लिए,
लड़ता रहता हूँ आजकल ख़ुद से।

तेरी यादें तो बस बहाने हैं,
मेरा झगडा है दर-असल ख़ुद से।

इस से पहले के साजिशें होतीं,
ढह गया सपनों का महल ख़ुद से।

जब से वो हमसफ़र हुए हैं मेरे,
मंजिलें हो गयीं सहल ख़ुद से।

triveni – sankalp sharma

बिन मिटे किसने देखी है जन्नत,
ये दरिया डूब के ही पार हुआ

इसका ‘नेचर’ कुछ कुछ तुमसा है

तेरी बातें तेरे अल्फाज़ – sankalp sharma

अब अक्सर…
तेरी बातें तेरे अल्फाज़,
यूँ मुट्ठी में दबाए फिरता हूँ।
जैसे बच्चे के हाथों में
पूरे हफ़्ते की ’जेबखर्ची’ के सिक्के।
जितना कसके पकड़ता हूँ.. कमबख़्त!
फिसलते जाते हैं यूँ ही।
जैसे फिसले थे तेरे सुर्ख लबों से उस दिन,
वो जाँफरोज़ अल्फाज़ …
वो नग्मगीन बात…

वही बातें वही अल्फाज़
जिन्हें थामे रखा था
एक मुद्दत से…

बह गए हाथ से
और छोड़ गए चन्द लकीरें

कभी फुर्सत मिले तो
फिर से एक दिन,
तुम चली आना….
इन हाथों की लकीरों से,
तुम्हें कुछ याद आएगा,
इन हाथों की लकीरों को,
ज़रा सा ग़ौर से सुनना ….

सुना है आजकल…
ये लकीरें बात करती हैं…।

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