त्रिवेणी – गुलज़ार

त्रिवेणी बह निकली –
शुरू शुरू में तो जब यह फॉर्म बनाई थी, तो पता नहीं था यह किस संगम तक पहुँचेगी – त्रिवेणी नाम इसीलिए दिया था कि पहले दो मिसरे, गंगा-जमुना की तरह मिलते हैं
और एक ख़्याल, एक शेर को मुकम्मल करते हैं लेकिन इन दो धाराओं के नीचे एक और नदी है – सरस्वती

जो गुप्त है नज़र नहीं आती; त्रिवेणी का काम सरस्वती दिखाना है

तीसरा मिसरा कहीं पहले दो मिसरों में गुप्त है, छुपा हुआ है ।
– गुलज़ार

1.

उड़ के जाते हुए पंछी ने बस इतना ही देखा
देर तक हाथ हिलाती रही वह शाख़ फ़िज़ा में

अलविदा कहने को ? या पास बुलाने के लिए ?

2.

क्या पता कब कहाँ मारेगी ?
बस कि मैं ज़िंदगी से डरता हूँ

मौत का क्या है, एक बार मारेगी

3.

सब पे आती है सब की बारी से
मौत मुंसिफ़ है कम-ओ-बेश नहीं

ज़िंदगी सब पे क्यों नहीं आती ?

4.

कौन खायेगा ? किसका हिस्सा है
दाने-दाने पे नाम लिख्खा है

सेठ सूद चंद, मूल चंद जेठा

Advertisements

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s