मोड़ को पकडे खडा हूं ।

चला जाऊंगा, मैं
कोई और राह पकडकर
यही सोचा होगा तुमने
मोड़ पर मुझसे बिछुडकर
किंतु़‌ ‌ मैं तो मोड़ को ही पकडकर
अब तक खडा हूं
सिर्फ,इतनी आस में
शायद कभी तुम मुड के आओ
देखकर के मोड़ खाली
सडक खाली
तुम कहीं फिर मुड न जाओ
तुम वहीं फिर मुड न जाओ
मैं सडक पकडे खडा हूं
यह सडक का मोड़ मुझको प्राण से ज्यादा सगा है
यों बरसों-बरस इसने
मुझको सताया है
ठगा है
किंतु़,साक्छी हैं
गगन-धरती-दस दिशाएं
भले कितनी ही रही हों
कठिन दुष्कर प्रतीक्षाएं
मोड़ पर से उचकते -झांकते अब तक नही है
आंख झपकी
ना ही टपकी-डबडबाई
क्योंकि है विश्वास
लौटोगे यहीं से
और पाओगे मुझे यों
राह तकते
तो तुम भी तो उछल जाओगे खुशी से
तुम्हे देने को तनिक सी खुशी
मील के पत्थर सा
सडक जकडे खडा हूं
तुम जहां से मुड गये थे
आज भी उस मोड़ को पकडे खडा हूं ।

– अरविंद पथिक

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