फ़ासले ऐसे भी होंगे

फ़ासले ऐसे भी होंगे, ये कभी सोचा न था
सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था।

वो कि ख़ुशबू की तरह फैला था मेरे चार सू
मैं उसे महसूस कर सकता था, छू सकता न था।

रात भर उसकी ही आहट कान में आती रही
झाँक कर देखा गली में, कोई भी आया न था।

अक्स तो मौजूद थे, पर अक्स तनहाई के थे
आईना तो था मगर, उस में तेरा चेहरा न था।

आज उसने दर्द भी अपने अलहदा कर दिए
आज मैं रोया तो मेरे साथ वो रोया न था।

ये सभी वीरानियां, उस के जुदा होने से थीं
आँख धुंधलाई हुई थी, शहर धुंधलाया न था।

याद कर के, और भी तकलीफ होती थी अदीम
भूल जाने के सिवा, अब कोई भी चारा न था।

भाग्यलिपि

प्लेटफार्म पर रखी
वजन तुलने की मशीन पर
चढ़ गया कुत्ता
मैंने कौतुहलवश
एक रूपये का सिक्का
मशीन में डाल दिया
टिकट निकला
वजन आ गया था
और पीछे छपी थी
भाग्यलिपि
आपकी वाणी में
चमत्कार
शक्ति दातों में है
भारत का प्रजातंत्र
आपके हाथों में है ।

दिमाग की खोज

एक साहब के दिमाग को घुन लग गया

बड़े परेशान हुए , अस्पताल में गए

लेकिन डॉक्टर साफ टाल गए

बोले स्पेयर दिमाग ले आइये

चेंज कर देंगे

इस दिमाग की जगह

उस दिमाग को धर देंगे

कनाट प्लेस में नयी-नयी खुली थी दुकान

साहब वहां पहुंचे हैरान, परेशान

सेल्समेन ने कई तरह के दिमाग दिखाए

‘ये दिमाग रेगिस्तानी है, ये आबू का है,

ये गरम है, ये ठंडा है,’

ये एक अफसर का है, ये एक बाबु का है

ये व्यापारी का है जरा यूस्ड है

सस्ता है ।

ये एक नारी का है, बेहद नाज़ुक है

जरा खस्ता है,

‘जरा ऊँचे दामों में भी दिखलायें’, साहब जी बोले

सेल्समेन ने कुछ और भी बण्डल खोले

‘ये एक एक्टर का है,

इंकम टैक्स बचाने में ज्यादा काम आयेगा

ये एक्ट्रेस का है

नए -नए फैशन सिखलाएगा

ये एक कवि का है , नए- नए वाद ढूंढेगा

ये एक गुरु का है

देश ही नहीं , विदेशों में भी चेले मून्देगा

साहबजी बोले ये सब तो ज्यादा ही यूस्ड हैं

इस पर सेल्समेन जरा मुस्कुराया

फ्रिज में से निकल कर एक बण्डल ले आया

‘ये चीज़ बड़ी रेयर है , हाल ही में आई है

बड़ी खोज के बाद हमें मिल पाई है

यह नेता का दिमाग है , बहुत कम पाया जाता है,

अगर होता भी है तो काम में बहुत कम लाया जाता है

यह बिल्कुल ही अन यूस्ड है

ये बिल्कुल ही ताज़ा है।

आपबीती को मैं जगबीती बनाता हूँ

न मैं कंघी बनाता हूँ न मैं चोटी बनाता हूँ
ग़ज़ल में आपबीती को मैं जगबीती बनाता हूँ
ग़ज़ल वह सिन्फ़-ए-नाज़ुक़ है जिसे अपनी रफ़ाक़त से
वो महबूबा बना लेता है मैं बेटी बनाता हूँ
हुकूमत का हर एक इनआम है बंदूकसाज़ी पर
मुझे कैसे मिलेगा मैं तो बैसाखी बनाता हूँ
मेरे आँगन की कलियों को तमन्ना शाहज़ादों की
मगर मेरी मुसीबत है कि मैं बीड़ी बनाता हूँ
सज़ा कितनी बड़ी है गाँव से बाहर निकलने की
मैं मिट्टी गूँधता था अब डबल रोटी बनाता हूँ
वज़ारत चंद घंटों की महल मीनार से ऊँचा
मैं औरंगज़ेब हूँ अपने लिए खिचड़ी बनाता हूँ
बस इतनी इल्तिजा है तुम इसे गुजरात मत करना
तुम्हें इस मुल्क का मालिक मैं जीते-जी बनाता हूँ
मुझे इस शहर की सब लड़कियाँ आदाब करती हैं
मैं बच्चों की कलाई के लिए राखी बनाता हूँ
तुझे ऐ ज़िन्दगी अब क़ैदख़ाने से गुज़रना है
तुझे मैँ इस लिए दुख-दर्द का आदी बनाता हूँ
मैं अपने गाँव का मुखिया भी हूँ बच्चों का क़ातिल भी
जलाकर दूध कुछ लोगों की ख़ातिर घी बनाता हूँ

– मुनव्वर राना

ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं

ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं

तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं।

हमने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यहाँ

सामने जिनके वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं।

मेरे हाथों की चाहो तो तलाशी लेलो

मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं।

या खुदा, अब के ये किस रंग में आई है बहार

ज़र्द ही ज़र्द है पेड़ों पे, हरा कुछ भी नहीं।

दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है, किसी बच्चे की तरह

या तो सब कुछ ही इसे चाहिए, या कुछ भी नहीं।

आदमी, आदमी को क्या देगा

आदमी, आदमी को क्या देगा

जो भी देगा वही खुदा देगा

मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है

क्या मेरे हक में फ़ैसला देगा

जिन्दगी को करीब से देखो

इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा

हमसे पूछो दोस्ती का सिला

दुश्मनों का भी दिल हिला देगा

इश्क का ज़हर पी लिया जिसने

मसीहा भी क्या उसे दवा देगा

हर इंसान सिकंदर क्यूँ है

आज के दौर में ए दोस्त ये मंज़र क्यूँ है

ज़ख्म हर सर पे हर एक हाथ में पत्थर क्यूँ है

जब हकीक़त है कि हर जर्रे में तू रहता है

फिर ज़मीन पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी

अपनी नज़रों में हर इंसान सिकंदर क्यूँ है

ज़िंदगी जीने के काबिल ही नहीं दोस्त

वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है

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